Friday, April 17th, 2026

ट्रंप के फैसले से भारत को होगा फायदा, कच्‍चे तेल के खेल में बदलाव की उम्मीद

नई दिल्ली

अमेर‍िका ने पहले भारत को रूस से तेल खरीदने को कहा. अब राष्‍ट्रपत‍ि डोनाल्‍ड ट्रंप ने ऐसा फैसला ले ल‍िया है, ज‍िसका फायदा भारत को हो सकता है. इतना ही नहीं कच्‍चे तेल का पूरा खेल बदल सकता है. दरअसल, ईरान युद्ध से कच्‍चे तेल की कीमतें बेतहासा बढ़ रही हैं, इस पर लगाम लगाने के ल‍िए ट्रंप ने अमेरिका के 100 साल पुराने जोंस एक्ट (Jones Act) शिपिंग नियमों में 60 दिन की विशेष छूट देने का ऐलान किया है. यह भारतीय श‍िप‍िंग कंपन‍ियों के ल‍िए बल्‍ले बल्‍ले वाला वक्‍त है. इतना ही नहीं- इससे तेल की कीमतें कम हो सकती हैं, ज‍िसका फायदा भारत को हो सकता है. सवाल-जवाब से समझते हैं कैसे?

’जोंस एक्ट’ (Jones Act) आखिर क्या है?
जोंस एक्ट अमेरिका का बेहद सख्त समुद्री कानून है, जिसे साल 1920 में लागू किया गया था. यह कानून कहता है क‍ि अमेरिका के एक पोर्ट से दूसरे पोर्ट तक माल ले जाने वाला कोई भी जहाज पूरी तरह से अमेरिका में बना होना चाहिए. इसके अलावा, उस जहाज का मालिक भी अमेरिकी होना चाहिए और उसे चलाने वाला क्रू भी अमेरिका का होना चाह‍िए. यह कानून शिपिंग इंडस्‍ट्री को बचाने के लिए बनाया गया था।

ट्रंप प्रशासन ने इस एक्ट में 60 दिन की छूट क्यों दी है?
ट्रंप प्रशासन ने 60 दिन की यह खास छूट इसलिए दी है ताकि अमेरिका के अंदर तेल की सप्‍लाई लागत को तुरंत कम किया जा सके. ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें पहले ही आसमान छू रही हैं. ऐसे में विदेशी जहाजों को अमेरिकी बंदरगाहों के बीच तेल ले जाने की अनुमति देकर, अमेरिका अपनी घरेलू सप्लाई चेन की बाधाओं को दूर करना चाहता है और अपनी जनता को महंगाई से फौरी राहत देना चाहता है।

ईरान युद्ध का अमेरिका के इस जोंस एक्ट से क्या लेना-देना है?
ईरान युद्ध ने होर्मुज को लगभग ठप कर दिया है. वहां से कच्चे तेल की सप्लाई रुकने के कारण पूरी दुनिया में तेल का भारी संकट पैदा हो गया है. इस कमी की भरपाई के लिए और घरेलू मांग को सुचारू रखने के लिए अमेरिका को अपने तेल वितरण को तेज करना था, जिसके लिए जोंस एक्ट जैसी सख्त पाबंदी को कुछ समय के लिए हटाना जरूरी था।

इस छूट से तेल मार्केट पर क्या असर पड़ेगा?
अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है. अब वह अपनी घरेलू आपूर्ति को सुचारू करने के लिए सस्ते विदेशी जहाजों का इस्तेमाल करेगा. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कमी में थोड़ी गिरावट आएगी. इससे ग्लोबल सप्लाई चेन का तनाव कम होगा और दुनिया भर में आसमान छूती तेल की कीमतों पर कुछ हद तक ब्रेक लगने की पूरी संभावना है।

भारत के लिए अमेरिका के इस फैसले के क्या सीधे मायने हैं?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए लगभग 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में होने वाली कोई भी कमी भारत के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं होती. जोंस एक्ट में इस छूट से अगर ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल के दाम थोड़े भी स्थिर होते हैं, तो भारत का आयात बिल काफी हद तक कम हो जाएगा, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार की बड़ी बचत होगी और आर्थिक स्थिरता आएगी।

क्या भारतीय शिपिंग कंपनियों को इस छूट का कोई सीधा फायदा मिलेगा?
बिल्कुल, भारतीय शिपिंग कंपनियों के लिए यह एक बहुत ही अप्रत्याशित और सुनहरा अवसर साबित हो सकता है. साठ दिनों की इस छूट के दौरान, भारत के ध्वज वाले या भारतीय कंपनियों के स्वामित्व वाले कमर्शियल जहाज भी अमेरिकी बंदरगाहों के बीच तेल का परिवहन कर सकेंगे. चूंकि भारतीय जहाजों की संचालन और लेबर लागत अमेरिकी जहाजों की तुलना में काफी कम होती है, इसलिए उन्हें इस संकट काल में अमेरिकी कंपनियों से काफी अच्छे और महंगे ठेके मिलने की उम्मीद है

अमेरिका के घरेलू तेल परिवहन के सुधरने से भारत का क्या संबंध है?
अमेरिका का घरेलू तेल परिवहन भारत के लिए इसलिए मायने रखता है क्योंकि अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक है. जब वहां तेल एक जगह से दूसरी जगह आसानी से और सस्ते में पहुंचता है, तो अमेरिकी रिफाइनरियों की क्षमता का अधिकतम इस्तेमाल होता है. इसका सीधा मतलब है कि वैश्विक बाजार में रिफाइंड तेल उत्पादों की आपूर्ति बढ़ जाती है. यह बढ़ी हुई सप्लाई भारत जैसे विकासशील देशों के लिए कीमतों को नियंत्रण में रखने में बहुत मदद करती है।

क्या भारत अब अमेरिका से ज्यादा तेल आयात करेगा?
भारत पहले से ही अमेरिका से एक निश्चित मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है. जोंस एक्ट में इस नई छूट का मुख्य असर भले ही अमेरिका के घरेलू परिवहन पर होगा, लेकिन इससे वहां के निर्यात टर्मिनलों तक तेल का पहुंचना ज्यादा सस्ता और तेज हो सकता है. अगर इसके परिणामस्वरूप अमेरिकी तेल की निर्यात कीमतें भारत के लिए और अधिक आकर्षक और प्रतिस्पर्धी हो जाती हैं, तो भारत निश्चित रूप से मध्य पूर्व पर अपनी निर्भरता कुछ कम करके अमेरिका से आयात बढ़ा सकता है।

ईरान संकट के बीच क्या भारत के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक राहत है?
कूटनीतिक लिहाज से यह भारत के लिए एक बहुत बड़ी राहत है. ईरान संकट के कारण भारत भारी कूटनीतिक दबाव का सामना कर रहा है, क्योंकि उसके ईरान और अमेरिका दोनों के साथ काफी गहरे और ऐतिहासिक संबंध हैं. होर्मुज में फंसे जहाजों और तेल संकट को देखते हुए, अमेरिका का यह कदम भारत को एक अप्रत्यक्ष कूटनीतिक स्पेस देता है. भारत बिना किसी गुट का खुले तौर पर पक्ष लिए इस आर्थिक राहत का पूरा फायदा उठा सकता है।

 

 

#india

Source : Agency

आपकी राय

15 + 12 =

पाठको की राय