Tuesday, April 21st, 2026

अदालत ने उठाया मज़ाकिया लेकिन गंभीर सवाल: कुत्तों से प्रमाणपत्र क्यों नहीं लिया जा सकता?

नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को लावारिस कुत्तों के मामले पर सुनवाई हुई। इस दौरान एक याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उनके इलाके में बहुत सारे लावारिस कुत्ते हैं, जो पूरी रात एक-दूसरे का पीछा करते रहते हैं, भौंकते हैं, जिससे उन्हें नींद नहीं आती और उनके बच्चे पढ़ाई नहीं कर पाते। याचिकाकर्ता ने इस मामले में अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन उनका कहना कि वे केवल वैक्सीनेशन और स्टरलाइजेशन कर सकते हैं। एनएचआरसी को भी भी पत्र लिखा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल्स (एबीसी नियम) केवल एक खास दायरे में काम करते हैं। कुत्तों को स्टरलाइजेशन या वैक्सीनेशन के बाद फिर से छोड़ दिया जाता है। एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा कि दुनियाभर में यह स्वीकार किया जाता है कि लावारिस कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए प्रभावी नसबंदी व्यवस्था जरूरी है। जयपुर और गोवा जैसी जगहों में यह सिस्टम सफल रहा है, लेकिन ज्यादातर शहरों में स्टरलाइजेशन प्रभावी नहीं हो पा रहा। स्टरलाइजेशन से कुत्तों की आक्रामकता कम होती है, लेकिन समस्या यह है कि कई शहरों में सही ढंग से यह नहीं हो रहा। इसे बेहतर बनाने के लिए पारदर्शिता लानी होगी और लोगों को जवाबदेह बनाना होगा।
एक ऐसा सिस्टम होना चाहिए जहां लोग उन लावारिस कुत्तों की रिपोर्ट कर सकें जिनका स्टरलाइजेशन नहीं हुआ है। इसे किसी वेबसाइट पर दर्ज किया जाए और कोई विशेष अथॉरिटी हो जो ऐसी शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई करे।
प्रशांत भूषण के इस सुझाव पर जस्टिस संदीप मेहता ने टिप्पणी की कि हम कुत्तों से खुद सर्टिफिकेट लेकर चलने को क्यों नहीं कह सकते। प्रशांत भूषण ने कहा कि कोर्ट की कुछ टिप्पणियां गलत संदेश दे सकती हैं। उदाहरण के लिए इसी कोर्ट ने कहा था कि कुत्तों के काटने के लिए फीडर्स को जिम्मेदार ठहराया जाए, जो शायद व्यंग्य था। जस्टिस विक्रम नाथ ने स्पष्ट किया कि यह व्यंग्य में नहीं कहा गया था, बल्कि बहुत गंभीरता से कहा गया था।
इसके अलावा, एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट और पूर्व केंद्रीय मंत्री द्वारा इस मामले पर किए गए पॉडकास्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई। कोर्ट ने पूर्व मंत्री की तरफ से पेश हुए वकील राजू रामचंद्रन से कहा कि थोड़ी देर पहले आप कोर्ट से टिप्पणियों को लेकर सावधान रहने की बात कर रहे थे। क्या आपको पता है कि आपके क्लाइंट किस तरह की बातें कर रही हैं? आपके क्लाइंट ने कोर्ट की अवमानना की है। हम उस पर ध्यान नहीं दे रहे, यह हमारी दरियादिली है। क्या आपने उनका पॉडकास्ट सुना है? उनकी बॉडी लैंग्वेज कैसी है? वह क्या कहती हैं और कैसे कहती हैं। आपने टिप्पणी की कि कोर्ट को सावधान रहना चाहिए, लेकिन दूसरी ओर आपकी क्लाइंट जिसे चाहे और जिसके बारे में चाहे, हर तरह की टिप्पणियां कर रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट इस मामले में मानव सुरक्षा, एबीसी नियमों के क्रियान्वयन और जानवरों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने पर विचार कर रहा है। सुनवाई आगे जारी रहेगी।

 

#Supreme Court

Source : Agency

आपकी राय

8 + 4 =

पाठको की राय