सोनम वांगचुक ने उठाई कार्रवाई की मांग! पत्थरबाजों पर सख्ती और CJP को जश्न पर दी सलाह
नई दिल्ली
नीट पेपर लीक के मुद्दे पर 26 दिनों तक अनशन करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक गुरुग्राम के अस्पताल से डिस्चार्ज होकर राजघाट पहुंचे और बापू को नमन किया। वांगचुक ने कहा कि महात्मा गांधी का तरीका 100 साल बाद भी उतना प्रासंगिक है और 1000 साल बाद इतना ही रहेगा। वांगचुक ने कहा कि सफलता (धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा) लाठी-पत्थर से नहीं, अपने शरीर पर लिए दर्द (अनशन) से मिली है। उन्होंने यह भी साफ किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर ऐक्शन ना हो, लेकिन गड़बड़ी करने वालों पर वह ऐसा नहीं कहेंगे। उन्होंने जश्न मना रही सीजेपी को भी नसीहत दी है।
लद्दाख वापस जाने से पहले पत्नी गीतांजलि के साथ राजघाट पहुंचे वांगचुक ने मीडिया से बातचीत की। उन्होंने कहा, मैं सबसे पहले बापू को याद करने, उन्हें कृतज्ञता व्यक्त करने राजघाट आना चाहता था। देश को बताना चाहता था कि उनका बताया रास्ता आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 100 साल पहले थे। लोग कहते हैं कि ऐसे शासन में या ऐसे शासक के सामने ऐसे तरीके नहीं चलते हैं। मुझे लगता है कि ऐसे तरीके जनता के दिल तक बात पहुंचाते हैं। मुझे लगता है कि कोई भी सरकार जनता की बात सुनती है, भले ही आंदोलन करने वालों की ना सुनें। उनका (गांधी का) जो तजुर्बा था उसे फिर सफल होते देखा। इससे पहले लद्दाख में हम इसका प्रयोग करते रहे हैं। मुझे देश के स्तर पर नहीं पता था। मुझे तस्सली हुई कि यह 100 साल बाद भी या 1000 साल बाद भी प्रासंगिक होगा। मैं भारत और दुनिया की जनता से कहना चाहता हूं कि बापू के दिखाए रास्ते पर ही अपनी व्यथा सुनाएं। इसमें देर है, लेकिन अंदेर नहीं।'
लाठी-पत्थर नहीं, खुद को दी पीड़ा से सफलता मिली: वांगचुक
सोनम वांगचुक ने गांधीवादी तरीकों को असरदार बताते हुए कहा कि इस आंदोलन को जो सफलता मिली है वह लाठी-पत्थर से नहीं, बल्कि शांतपूर्ण तरीकों और अनशन से मिली है। उन्होंने कहा,'यदि आप खुद को पीड़ा दें, अपने शरीर पर पीड़ा लें और किसी दूसरे को पीड़ा ना दें तो कठोर से कठोर दिल को पिघला सकता है। यह हमने फिर देखा है। मैं इस देश के युवा पीढ़ी और सभी नागरिकों को, युवा आयोजकों को बधाई देता हूं। हमें यह समझना होगा कि अगर यह हल अगर हुआ है तो वह बाजुओं की ताकत, लाठियों या पत्थर से नहीं हुआ है। शांति की अपील से हुआ है, खुद पर जो हमने पीड़ा ली, उससे हुआ है, बल्कि पत्थर और लाठियों से बात और बिगड़ने का डर था। बहुत डर था, जिस कारण मुझे इस शांतपूर्ण पथ को समय से पहले रोका पड़ा।'

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