Tuesday, August 4th, 2026

दतिया उपचुनाव के नतीजों के बाद मोहन सरकार एक्शन मोड में, मंत्रिमंडल और अफसरशाही में हो सकते हैं बड़े बदलाव

भोपाल 
मध्यप्रदेश की दतिया सीट पर हुए उप चुनाव के परिणाम सोमवार को घोषित होने के बाद अब  प्रदेश में अगले एक महीने में सत्ता व प्रशासनिक स्तर पर कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। एक बार फिर मंत्रिमंडल विस्तार के नए समीकरण बनने के आसार हैं। सबकुछ ठीक रहा तो यह मोहन मंत्रिमंडल में पहला फेरबदल होगा। पूर्व में कांग्रेस से भाजपा के हुए रामनिवास रावत को मंत्री बनाकर शामिल किया था लेकिन हारने के बाद वे बाहर हो चुके हैं। प्रशासनिक स्तर पर भी कई बदलाव देखने को मिल सकते हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय में ही नए सिरे से जमावट हो सकती है। इन दोनों बड़े बदलावों की सुगबुगाहट पहले से है लेकिन दतिया के परिणामों का इंतजार किया जा रहा है।

सरकार की अग्निपरीक्षा वाले होंगे अगले दो साल
असल में ऐसा इसलिए क्योंकि अब सरकार के पास गिने-चुने दो साल बचे हैं। उसमें भी एक साल सिंहस्थ कराने और उसके पहले की तैयारियों में बीतना तय है। इसी बीच नगरीय निकाय चुनाव होने हैं। सूत्रों के मुताबिक अब सरकार दो साल तक अघोषित रूप से चुनावी मोड में काम करेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि करीब 22 साल (कांग्रेस की कमल नाथ सरकार के कार्यकाल को छोड़कर) से सत्ता में काबिज भाजपा सरकार के सामने कई अदृश्य चुनौतियां है, जो कम होने की बजाए बढ़ रही हैं।

चुनाव तक कई फ्रंट खुलने की आशंका
विपक्ष इन तमाम अवसरों को भुनाने में कसर नहीं छोड़ रहा तो दिल्ली छात्र आंदोलन के बाद मप्र में भी कई फ्रंट खुलने की प्रबल संभावना है। इन तमाम अदृश्य चुनौतियों को भांपते हुए सरकार परिणाम देने वाले मंत्रियों की संख्या बढ़ाना चाहती है। इसके लिए उन मंत्रियों को हटाया जा सकता है, जो मंत्री मंडल में रहते हुए नई लकीरें नहीं खींच पाए।

नॉन परफॉर्मेंस अफसर मुख्यधारा से हटेंगे
मुख्यमंत्री कार्यालय में लंबे समय से जमें उन अफसरों को भी हटाया जा सकता है जो केवल फाइलें साइन कराने तक ही सीमित रह गए। सीएम से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सीएम न केवल मंत्रियों से बल्कि अधिकारियों से भी अपेक्षा करते हैं कि जनता की सहूलियतों वाले काम हो, दोनों ही मोर्चे पर जमीनी स्तर पर पकड़ मजबूत हो।

ये क्षेत्र, जिनसे लोगों को और अपेक्षा…
शिक्षाः युवा पीढ़ी सस्ती और गुणवत्तायुक्त शिक्षा चाहती है। प्रदेश में इस पर बढ़ी राशि खर्च की जा रही है लेकिन अब भी कक्षा 1 से 12वीं तक अच्छी और गुणवत्तायुक्त शिक्षा के अवसर कम हैं। निजीकरण हावी है। शहरों में मनमानी वाले प्ले स्कूलों ने घर कर लिया है। मेडिकल व तकनीकी क्षेत्रों की पढ़ाई आम युवा की पकड़ से दूर है। कुछ को ही लाभ मिल रहा।

स्वास्थ्यः कहने को आयुष्मान योजना, सरकारी अस्पताल हैं, लेकिन आम मरीजों को कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों पर बड़ी राशि खर्च करनी पड़ रही है। करोड़ों खर्च वाले सरकारी अस्पतालों से कम खर्च वाले निजी अस्पतालों से कमजोर प्रबंधन मुसीबत बना हुआ है।

रोजगारः युवाओं को रोजगार के अवसर कम मिल पा रहे हैं। आउटसोर्स को रोजगार उपलब्ध कराने की श्रेणी में शामिल कर रखा है, जिसमें 10 से 18 हजार रुपए मानदेय मिल रहा है, जो एक तरह से मजदूरी जैसा पैटर्न है।

किसानः किसानों के लिए कई योजनाएं चल रही हैं लेकिन जब भी खाद, बीज की जरूरत होती है, तब मारामारी वाली स्थिति बन रही है। समर्थन मूल्य पर गेहूं, मूंग व धान बेचने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। हाल की गेहूं व मूंग खरीदी के दौरान इनकी नाराजगी उदाहरण है।

 

#mohan

Source : Agency

आपकी राय

5 + 3 =

पाठको की राय