Sunday, April 19th, 2026

असम CM के बयान पर कानूनी लड़ाई, ‘मियां’ शब्द को लेकर जमीअत सुप्रीम कोर्ट पहुंची

देश 

जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर किया है। याचिका में सरमा के हालिया सार्वजनिक बयान को सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ बताया गया है। साथ ही संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के भाषणों के लिए एक कठोर नियामक दिशा-निर्देश तय करने की मांग की गई है।

जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने अपने अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के माध्यम से सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिसवा सरमा के हालिया सार्वजनिक बयान को घृणा आधारित, सांप्रदायिक रूप से भड़काऊ और संवैधानिक मूल्यों का खुला उल्लंघन बताया है।

याचिका में असम के मुख्यमंत्री के 27 जनवरी 2026 को दिए गए उस भाषण का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, जिसमें उन्होंने यह दावा किया कि चार से पांच लाख ‘मियां’ वोटर्स को मतदाता सूची से बाहर कर दिया जाएगा। याचिका के अनुसार, ‘मियां’ शब्द असम में मुसलमानों के लिए अपमानजनक और बेइज्जती करने वाले तरीके से प्रयोग किया जाता है।

याचिका में आगे कहा गया है कि असम के मुख्यमंत्री एक ऊंचे संवैधानिक पद आसीन हैं। उनका उपरोक्त भाषण किसी भी तरह से केवल अभिव्यक्ति के दायरे में नहीं आता। इसका एकमात्र और प्रमुख उद्देश्य एक समुदाय के विरुद्ध नफरत, दुश्मनी और दुर्भावना को बढ़ावा देना है। ऐसे बयानों से सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचा है और एक विशेष समुदाय को सामूहिक रूप से निशाना बनाया गया है, जो अपने पद की गरिमा के साथ गद्दारी है।

जमीअत उलमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी अपील की है कि वह संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के भाषणों के लिए एक कठोर नियामक दिशा-निर्देश तय करे। इससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी व्यक्ति संवैधानिक पद की आड़ में सांप्रदायिक नफरत फैलाने, उकसाने या किसी समुदाय को बदनाम करने का अधिकार न रखता हो। ऐसी संहिता इस सिद्धांत को मजबूत करेगी कि कोई भी व्यक्ति संविधान और कानून से ऊपर नहीं है और यही अवधारणा कानून के शासन का आधार है।

याचिका में कहा गया है कि इस तरह के बयान भारत के संविधान में प्रदत्त समानता, भाईचारे, धर्मनिरपेक्षता और इंसानी गरिमा की गारंटी को कमजोर करते हैं और अभिव्यक्ति की आजादी के संरक्षण में नहीं आ सकते। जमीअत ने इस ओर भी ध्यान दिलाया है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नफरती बयानों के विरुद्ध स्वतः संज्ञान लेने से संबंधित स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद ऐसे बयानों का जारी रहना चिंताजनक है।

ज्ञात रहे कि यह याचिका जमीअत उलमा-ए-हिंद की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही विचाराधीन हेट स्पीच और पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अपमान के खिलाफ रिट पिटीशन नंबर 1265/2021 में संलग्न की गई है। इस मामले में चार साल की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाने से पहले जमीअत उलेमा-ए-हिंद के सीनियर वकील एमआर शमशाद और एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड फर्रुख रशीद से कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सुझाव मांगे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि उनके अनुसार में देश में हेट स्पीच को रोकने के लिए कौन से प्रभावी और उपयोगी कदम आवश्यक हैं।

 

#amiat files petition in Supreme Court

Source : Agency

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