Thursday, April 23rd, 2026

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का हलफनामा दाखिल: West Bengal SIR को जरूरी बताने के रखे ठोस आधार

नई दिल्ली 
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर उठाए गए आरोपों का जवाब दिया है। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि SIR प्रक्रिया के कारण मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने के आरोप अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किए जा रहे हैं और यह निहित राजनीतिक हित साधने के लिए किया जा रहा है। सांसद डोला सेन ने 24 जून और 27 अक्टूबर 2025 को जारी SIR आदेशों की वैधता को चुनौती देते हुए जनहित याचिका दायर की थी। इसके जवाब में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे में स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया संवैधानिक रूप से अनिवार्य, सुस्थापित और नियमित रूप से संचालित की जाती है।

चुनाव आयोग का तर्क
चुनाव आयोग ने कहा कि मतदाता सूचियों की शुद्धता और अखंडता सुनिश्चित करने के लिए SIR आवश्यक है। आयोग ने इस प्रक्रिया का हवाला टीएन शेषन बनाम भारत सरकार (1995) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मान्यता प्राप्त होने के साथ जोड़ा। आयोग ने कहा कि SIR संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 15, 21 और 23 के अंतर्गत आता है, जो चुनाव आयोग को आवश्यकता पड़ने पर मतदाता सूचियों में विशेष संशोधन करने का अधिकार देता है।

SIR क्यों जरूरी है?
हलफनामे में कहा गया कि 1950 के दशक से मतदाता सूचियों में समय-समय पर संशोधन किए जाते रहे हैं। इसमें 1962-66, 1983-87, 1992, 1993, 2002 और 2004 जैसे वर्षों में देशव्यापी संशोधन शामिल हैं। पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और मतदाताओं की बढ़ती गतिशीलता के कारण मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम जोड़ना और हटाना नियमित प्रक्रिया बन गई है।
 
चुनाव आयोग ने कहा कि दोहराई गई और गलत प्रविष्टियों का जोखिम बढ़ने के कारण तथा देश भर के राजनीतिक दलों की शिकायतों को ध्यान में रखते हुए अखिल भारतीय स्तर पर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का निर्णय लिया गया है। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि इसे संवैधानिक और वैधानिक प्रक्रिया के रूप में मान्यता दी जाए और राजनीतिक आरोपों से स्वतंत्र रूप से देखा जाए।

 

 

#Election Commission tells Supreme Court

Source : Agency

आपकी राय

13 + 7 =

पाठको की राय