कमांड हॉस्पिटल से अपोलो तक ग्रीन कॉरिडोर, हार्ट ट्रांसप्लांट से बची मासूम की जान
नई दिल्ली
शोक की गहरी छाया के बीच जब उम्मीद की एक किरण जन्म लेती है, तो वह इंसानियत की सबसे सुंदर तस्वीर बन जाती है। चंडीमंदिर स्थित कमांड हॉस्पिटल में 2 मई 2026 को कुछ ऐसा ही हुआ, जब एक 41 साल की महिला को ब्रेन डेड घोषित किए जाने के बाद उसके परिवार ने अपने दर्द को परे रखकर अंगदान का निर्णय लिया। एक ओर जहां परिवार अपूरणीय क्षति के दुख में डूबा था, वहीं दूसरी ओर उसी फैसले ने एक 14 साल के बच्चे की धड़कनों को नया जीवन दे दिया। यह कहानी सिर्फ एक ट्रांसप्लांट की नहीं, बल्कि साहस, संवेदना और मानवता के मोती को एक साथ पिरोया, जिसने कई जिंदगियों में उम्मीद की रोशनी भर दी।
कैसे अंजाम दिया मिशन
ब्रेन डेथ के बाद महिला का दिल इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल को भेजा गया। समय की संवेदनशीलता को देखते हुए अपोलो अस्पताल की एक स्पेशल टीम ने तुरंत एक चार्टर्ड प्राइवेट जेट की व्यवस्था की और चंडीगढ़ पहुंचकर दिल को सुरक्षित तरीके से दिल्ली लाया गया। तय समय-सीमा के भीतर इस हार्ट ट्रांसप्लांट को अंजाम दिया गया, जिससे एंड-स्टेज हार्ट फेल्योर से जूझ रहे 14 वर्षीय बच्चे को नई जिंदगी मिल गई। फिलहाल बच्चा आईसीयू में डॉक्टरों की निगरानी में स्थिर है।
कमांड हॉस्पिटल की जमकर तारीफ
इस जटिल और समयबद्ध ऑपरेशन को सफल बनाने में कई एजेंसियों का अहम योगदान रहा। कमांड हॉस्पिटल के कर्नल अनुराग गर्ग के प्रयास की खूब तारीफ की गई। वहीं इस काम के लिए हरियाणा ट्रैफिक पुलिस, पंजाब ट्रैफिक पुलिस ने चार्टर्ड फ्लाइट के लिए बिना देर किए व्यवस्था की और इस मिशन को अंजाम दिया गया।
दिल्ली में ट्रैफिक पुलिस ने बदरपुर ट्रैफिक इंचार्ज एसआई अनिल कुमार की निगरानी में एयरपोर्ट से अस्पताल तक ग्रीन कॉरिडोर बनाया, जिससे दिल को महज 20 मिनट में अस्पताल पहुंचा दिया गया। इस पूरे मिशन में प्राइवेट जेट टीम ने भी अहम भूमिका निभाई। अपोलो अस्पताल ने डोनर परिवार की इस असाधारण उदारता को नमन करते हुए भारतीय सेना, कमांड हॉस्पिटल, नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (NOTTO) और सभी संबंधित एजेंसियों का आभार जताया।
क्या बोले डॉक्टर
अस्पताल ने कहा कि यह घटना अंगदान के महत्व और सामूहिक प्रयास की ताकत का एक मजबूत उदाहरण है। अपोलो अस्पताल के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. मुकेश गोयल ने बताया कि बच्चा पिछले एक साल से गंभीर हृदय रोग से जूझ रहा था और हर महीने उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ता था। उन्होंने कहा कि हार्ट ट्रांसप्लांट ही उसके जीवन को बचाने का एकमात्र विकल्प था। दो महीने पहले ही उसे नोट्टो (NOTTO) में रजिस्टर किया गया था, लेकिन पिछले हफ्ते उसकी हालत फिर बिगड़ गई थी।
डॉ. गोयल के मुताबिक, 2 मई को कमांड हॉस्पिटल चंडीमंदिर में एक उपयुक्त डोनर हार्ट उपलब्ध हुआ। महिला को दो हफ्ते पहले ब्रेन हेमरेज हुआ था और वह ब्रेन डेड हो गई थीं। उनके परिवार ने अंगदान का फैसला लेकर कई जिंदगियां बचा लीं।
डॉक्टर के मुताबिक हार्ट ट्रांसप्लांट में समय बेहद अहम होता है और चार घंटे के भीतर दिल को प्रत्यारोपित कर रक्त संचार बहाल करना जरूरी होता है। डॉक्टरों की टीम दोपहर 1:30 बजे चार्टर्ड फ्लाइट से चंडीगढ़ रवाना हुई और शाम 7:30 बजे दिल्ली लौट आई। ग्रीन कॉरिडोर की मदद से दिल को आधे घंटे में अस्पताल पहुंचाया गया और आधी रात तक सफल ट्रांसप्लांट पूरा कर लिया गया। मरीज को अब कार्डियक सर्जरी आईसीयू में रखा गया है।

पाठको की राय